Journal of Research in Ayurvedic Sciences

EDITORIAL
Year
: 2021  |  Volume : 5  |  Issue : 1  |  Page : 1--3

Emphasis on integrative and inclusive health approaches: An essential current need


Narayanam Srikanth 
 Editor-in-Chief, Journal of Research in Ayurvedic Sciences, Central Council for Research in Ayurvedic Sciences, Ministry of Ayush, Government of India, New Delhi, India

Correspondence Address:
Dr. Narayanam Srikanth
Editor-in-Chief, Journal of Research in Ayurvedic Sciences, Director, General (Additional charge), Central Council for Research in Ayurvedic Sciences, Ministry of Ayush, Government of India, New Delhi.
India




How to cite this article:
Srikanth N. Emphasis on integrative and inclusive health approaches: An essential current need.J Res Ayurvedic Sci 2021;5:1-3


How to cite this URL:
Srikanth N. Emphasis on integrative and inclusive health approaches: An essential current need. J Res Ayurvedic Sci [serial online] 2021 [cited 2022 Dec 7 ];5:1-3
Available from: http://www.jrasccras.com/text.asp?2021/5/1/1/332445


Full Text



एकीकृत एवं समावेशित स्वस्थ दृष्टिकोण का महत्व{Figure 1}

पारंपरिक चिकित्सा और आधुनिक चिकित्सा का अंतर्संबंध समुदाय के स्वास्थ्य लाभ के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभावों की परस्पर क्रिया के कार्य पर आधारित है। इस संदर्भ में पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा का समन्वय कई महत्वपूर्ण विषयों को प्रस्तुत करता है, जिसमें अनुसंधान एवं विकास, चिकित्सा संबंधी शिक्षा का विनियमन, चिकित्सा पद्धति और औषधियों का उत्पादन, सांस्कृतिक प्रसार, चिकित्सा ज्ञान का समाजशास्त्र, व्यावसायीकरण, चिकित्सा, स्वास्थ्य और कल्याण उद्योग, सामाजिक शक्ति संरचना, सामाजिक संबंध और अंतर्राष्ट्रीय संबंध जैसे विविध क्षेत्र शामिल हैं।1-3 निश्चित रूप से, भारत में पारंपरिक चिकित्सा के विकास का अध्ययन, देश में स्वास्थ्य की स्थिति और स्वास्थ्य पद्धतियों पर नीति समर्थन और प्रावधानों के प्रभाव का अध्ययन बन जाता है। स्वास्थ्य प्रबंधन में स्वास्थ्य देखभाल संबंधी ट्रेंड एक महत्वपूर्ण कारक है; तथापि स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं से संबंधित योजनाओं और कार्यक्रमों के नियोजन स्तर के इस परिप्रेक्ष्य में सामान्यतः अधिक महत्व नहीं दिया जाता है। यह स्थिति जनसमान्य के स्वास्थ्य में उनकी स्वीकृति और उपयोगिता के स्तर को क्रमिक रूप से बाधित करती है। वर्तमान में स्वास्थ्य देखभाल व्यावसायिक (प्रोफेशनल) और नीति निर्माताओं ने यह मान लिया है कि सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं के विकास में समुदाय के स्वास्थ्य देखभाल व्यवहार को समझने की आवश्यकता और पारंपरिक चिकित्सा और पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल के तौर-तरीकों के उपयोग पर स्वीकृति एक दूरगामी पहल है। विभिन्न अवधियों के दौरान सरकार की नीतियों और रणनीतियों ने अनुसंधान के साथ-साथ नैदानिक अभ्यास में आयुष और पारंपरिक चिकित्सा के एकीकरण के मार्ग खोले हैं । भारत में स्वदेशी चिकित्सा पद्धतियों के ज्ञान के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक निर्धारकों का यह विश्लेषण अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस तरह का विश्लेषण, चिकित्सा की स्वदेशी प्रणालियों को पूरी तरह से अलग परिप्रेक्ष्य में रखता है।4-9 देश भर के विभिन्न राज्यों, क्षेत्रों और जातीय समूहों में स्वास्थ्य सेवा संबंधी व्यवहार का दस्तावेजीकरण करने के लिए कई प्रयास किए गए हैं। आयुष और एकीकृत चिकित्सा की उपयोगिता की जांच कई व्यवस्थित अध्ययनों के माध्यम से की गई है और सरकार द्वारा शुरू किए गए राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों की रिपोर्टों में भी यह परिलक्षित होती है। प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एन.एच.एम) (N.H.M) स्तर पर एलोपैथिक व्यवस्थाओं में आयुष सेवाओं के प्रसार ने एक स्थान पर चिकित्सा की विभिन्न प्रणालियों के भौतिक एकीकरण की व्यवहार्यता स्थापित की है ।10,11 इसके अतिरिक्त प्राथमिक और तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्थाओं में कुछ परिचालन अध्ययनों के परिणामों से कार्यात्मक एकीकरण की उपयोगिता की व्यवहार्यता और सीमा ज्ञात हुई है ।

इस तरह के अध्ययनों के माध्यम से कार्यात्मक एकीकरण के लिए योगदान देने वाले मुख्य कारकों में स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं के बीच बेहतर संचार शामिल है। पारंपरिक और रूढ चिकित्सा प्रणालियों ने प्रणाली शक्ति पर जागरूकता उत्पन्न करना, क्रॉस रेफरल में वृद्धि के अतिरिक्त पारंपरिक चिकित्सा के लाभों जैसे जीवन की गुणवत्ता (क्यू.ओ.एल) में सुधार, गैर संक्रामक रोगों (एन.सी.डी) और प्रजनन और बाल स्वास्थ्य (आर.सी.एच) देखभाल के संदर्भ में रुग्णता और मृत्यु दर की रोकथाम और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में योगदान दिया है ।12-14 इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य और रोग धारणाओं के लिए बुनियादी दृष्टिकोण में अंतर, पारंपरिक और रूढ स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों के बीच महामारी संबंधी अंतर जैसी कुछ चुनौतियाँ भी सामने आई हैं जो स्वास्थ्य देखभाल के एकीकृत तौर-तरीकों को विकसित करने में हस्तक्षेप करती हैं । मुख्यतः बुनियादी बातों को समझने और सामंजस्य के माध्यम से संभावनाओं की खोज करने के लिए विभिन्न प्रणालियों के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और स्वास्थ्य देखभाल व्यावसायिक के संपर्क में सुधार करके इन चुनौतियों का अच्छी तरह से समाधान किया जा सकता है । इसके अतिरिक्त, एक प्रावधान व्यापक स्वास्थ्य नीति जिसमें विभिन्न स्तरों जैसे शिक्षा अनुसंधान, नैदानिक अभ्यास और सार्वजनिक स्वास्थ्य के एकीकरण पर ध्यान केंद्रित करने वाले मुख्य घटक शामिल हैं, जो विस्तृत एकीकृत दृष्टिकोण के माध्यम से सतत और साक्ष्य आधारित स्वास्थ्य देखभाल वितरण का एक मजबूत आधार बनाने के लिए महत्वपूर्ण है। अपने मूल सिद्धांतों को साथ रखते हुए इन प्रणालियों के विवेकपूर्ण समामेलन के साथ सफल एकीकृत स्वास्थ्य देखभाल प्रतिमान विकसित किए जा सकते हैं।

डॉ. नारायणम श्रीकांत

मुख्य संपादक

आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान पत्रिका

महानिदेशक (प्रभारी)

केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद

आयुष मंत्रालय, भारत सरकार

नई दिल्ली, भारत

An interrelationship of traditional medicine (TM) and modern medicine is a function of inter-play of social, economic, and political forces for the health benefit of the community. Convergence of traditional and modern medicine in this context poses many critical issues, encompassing diverse fields such as research and development, regulation of medical education, medical practice, and production of medicines, cultural diffusion, sociology of medical knowledge, professionalization, the medical, health and wellness industry, social power structure, social relations, and international relations.[1],[2],[3] Certainly, studies of the development of the TM in India become the study of the impact of policy support and provisions on health status and health practices in the country. Health-care seeking trend is a pivotal factor in health management; however, this aspect is often not much emphasized at the planning stage of schemes and programs relating to health-care services. This situation results in successively hampering their levels of acceptance and utility in public health. Now it has been well recognized by health-care professionals and policy makers that the need for understanding the healthcare-seeking behavior of the community and its acceptance on usage of TM and conventional health-care modalities is the future step in developing community health services. The policies and strategies of Government during different periods opened avenues for integration of AYUSH and conventional medicine at research as well as clinical practice. This analysis of the social, economic, and political determinants of the knowledge of the indigenous systems of medicine in India is of crucial importance. Such an analysis places the indigenous systems of medicine in an entirely different perspective.[4],[5],[6],[7],[8],[9] Many attempts have been made to document the healthcare-seeking behavior in different states, zones, and ethnic groups across the country. The utility of AYUSH and integrative medicine have been examined through several systematic studies and also reflected in the reports of National Health Programs initiated by the Government. The introduction of AYUSH services in allopathic setups at the primary health-care level and the National Health Mission (NHM) established the feasibility of physical integration of different systems of medicine under one umbrella.[10],[11] Further, the outcomes of certain operational studies at Primary and Tertiary Health Care setups revealed the feasibility and extent of utility of functional integration.

The core factors identified as contributor for functional integration is improved communication among the health-care providers. The traditional and conventional medical systems have contributed in the area, through generation of awareness on the system strength, enhanced cross-referrals besides the benefits of add on TM interventions such as improvement in quality of life (QOL), prevention and management of morbidity and mortality in the context of noncommunicable diseases (NCDs), and reproductive and child health (RCH) care.[12],[13],[14] Also certain challenges have been posed which interferes in developing integrative modalities of health care such as differences in basic approach to health and disease perceptions, epistemological differences among conventional and traditional health-care systems. These challenges can be well addressed by improving communication among the academicians, researchers, and health-care professionals of different systems, principally for understanding the fundamentals and exploring the possibilities through harmonization. Furthermore, a provision of comprehensive health policy encompassing core components focusing on integration at different levels, viz. education research, clinical practice, and public health, is pivotal to make a strong base of sustainable and evidence-based health-care delivery through inclusive integrative approaches. Successful integrative health-care models could be developed with judicious amalgamation of these systems without losing their basic tenets.

Narayanam Srikanth

Editor-in-Chief

Journal of Research in Ayurvedic Sciences

 Financial support and sponsorship



Nil.

 Conflicts of interest



There are no conflicts of interest.

References

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9Albert S, Nongrum M, Webb EL, Porter JD, Kharkongor GC. Medical pluralism among indigenous peoples in northeast India: Implications for health policy. Trop Med Int Health 2015;20:952-60.
10Sharma AK. National rural health mission: Time to take stock. Indian J Community Med 2009;34:175-82.
11Priya R, Shweta AS. Status and Role of AYUSH and Local Health Traditions under the National Rural Health Mission: A Health Systems Study across 18 States. New Delhi: National Health Systems Resource Centre; 2010.
12Singh R, Ota S, Khanduri S, Rani S, Bhadula A, Sharma R, et al. Integration of AYUSH (Ayurveda and Yoga) with National Programme for Prevention and Control of Cancer, Diabetes, Cardiovascular Diseases and Stroke (NPCDCS): An appraisal of central council for research in ayurvedic sciences research and development initiatives. J Res Ayurvedic Sci 2018;2:27-36.
13Sharma S, McGreevey W, Kanjilal B, Hotchkiss DR. Reproductive and child health accounts: An application to Rajasthan. Health Policy Plan 2002;17:314-21.
14Budreviciute A, Damiati S, Sabir DK, Onder K, Schuller-Goetzburg P, Plakys G, et al. Management and prevention strategies for non-communicable diseases (NCDS) and their risk factors. Front Public Health 2020;8:574111.